Pratyay - प्रत्यय शब्द का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है, चाहे आप संस्कृत अध्ययन कर रहे हों या हिंदी भाषा का अध्ययन कर रहे हों। यह एक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो वाक्यों और शब्दों के अर्थ को साफ-साफ समझने में मदद करता है। इस आर्टिकल में, हम "प्रत्यय क्या है इसके कितने भेद हैं? - pratyay kya hai" के संदर्भ में बात करेंगे, ताकि आप इसके महत्व को अच्छे से समझ सकें। यह न केवल आपके अध्ययन को सुविधाजनक बनाएगा, बल्कि आपकी भाषा कौशल में सुधार करने में भी मदद करेगा।
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प्रत्यय किसे कहते हैं?
pratyay kise kahate hain :- जो दो अक्षरों, 'प्रति' और 'अय' से मिलकर बना है। 'प्रति' का मतलब होता है 'साथ में' और 'अय' का मतलब होता है 'चलने वाला।' इसका मतलब होता है 'साथ में लेकिन अंत में चलने वाला।' इसमे ऐसे शब्द होते हैं जो किसी अन्य शब्द या धातु के अंत में जुड़कर उसको एक नये रूप में निर्माण करता है। इन्हें शब्द के अंत में ही जोड़ा जाता है और जिस कारण से यह नए शब्दों का निर्माण करता है।
प्रत्यय का प्रयोग करके हम मूल शब्द के अर्थ को विभिन्न तरीकों से प्राप्त कर सकते हैं और इनका भाषा में महत्वपूर्ण उपयोग होता है, खासकर यौगिक शब्दों को बनाने में।
प्रत्यय की लघु परिभाषा : शब्द रचना के लिए शब्दों या धातु के अंत में प्रत्यय जोड़ते हैं और इससे एक नए शब्द का निर्माण होता है।
संस्कृत के माध्यम से प्रत्यय के कितने भेद होते हैं?
संस्कृत या हिंदी में जब हम शब्दों को लिखते अथवा बनाते हैं, तो उनमें 'प्रत्यय' भी होते हैं। प्रत्यय वो छोटे भाग होते हैं जो शब्दों में जुड़कर उन्हें अलग-अलग अर्थ देते हैं। संस्कृत में प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं :―
- कृत् Pratyay - जो क्रिया रूपों में लगते हैं।
- तद्धित Pratyay - जो अन्य शब्दों में लगते हैं।
(1). कृत् Pratyay :- जो प्रत्यय क्रिया धातु के बाद लगकर संज्ञा और विशेषण बनाते हैं, कृत प्रत्यय (krit pratyay) कहलाते हैं। जैसे ― सजावट, होनहार, पढ़ाई आदि।
कृत Pratyay मुख्य रूप से कितने होते हैं?
आसान शब्दों में कहें तो कृत प्रत्यय मुख्यतः चार (4) प्रकार के होते हैं :―
(क). क्रिया को करने वाला (कर्तृवाचक प्रत्यय)
(ख). क्रिया का कर्म (कर्मवाचक प्रत्यय)
(ग). क्रिया का परिणाम (भाववाचक कृदंत प्रत्यय)
(घ). क्रिया करने का साधन (करणवाचक कृदंत प्रत्यय)
(क). क्रिया को करने वाला (कर्तृवाचक प्रत्यय)
संस्कृत स्तोत्र वाले कर्तृवाचक प्रत्यय ―
दायक, पावन, गायक, नायक, लेखक, पाठक, कारक, धातुक, कामुक, भावुक, पाचक, नेता, दाता, धावक, त्यागी, अभिनेता, क्रेता, विक्रेता, उपकारी, भिक्षुक आदि।
हिंदी स्रोत वाले कर्तृवाचक प्रत्यय —
- अ – मेल, मार, बाढ़, लूट, रोक, चाल आदि।
- आ – झटका, झगड़ा, घेरा, फेरा, फोड़ा आदि।
- ऊ – खाऊ, नचाऊ, उड़ाऊ आदि।
- अक्कड़ – पियक्कड़, भुलक्कड़, बुझक्कड़, घुमक्कड़ आदि।
- आक – (तैराक), आलू (झगड़ालू), इयल (सड़ियल, अड़ियल, मरियल आदि।)
- आकू – पढ़ाकू, लड़ाकू, उड़ाकू, चढ़ाकू आदि।
- ऐया – नचैया, गवैया, खवैया, पढै़या आदि।
- दार – पल्लेदार, देनदार, देवदार, लेनदार आदि।
- ने वाला – गानेवाला, खानेवाला, सोनेवाला, पीनेवाला, जागनेवाला, पढ़नेवाला आदि।
- हार – होनहार, खेलनहार, राखनहार, खेवनहार आदि।
(ख). क्रिया का कर्म (कर्मवाचक प्रत्यय)
ये वाक्य में दिए गए प्रत्यय क्रिया के भाग होते हैं। वे 'कर्म' को दर्शाते हैं, जैसे - खाना, गाना, बिछौना, खिलौना, चटनी, बेलनी, सूँघनी, फेंकनी, उठावनी, पैरावनी, दिखावनी।
- ना - खाना, गाना, बिछौना, खिलौना।
- नी - चटनी, बेलनी, सूँघनी, फेंकनी।
- वनी - दिखावनी, पैरावनी, उठावनी।
(ग). क्रिया का परिणाम (भाववाचक कृदंत प्रत्यय)
यहाँ कुछ शब्द हैं जो क्रियाओं के परिणाम को दर्शाते हैं। इन शब्दों को जोड़कर भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं, जैसे -
- आई - पढ़ाई, लिखाई, बुनाई, सिलाई।
- आन - पहचान, मिलान, उठान।
- आवट - मिलावट, सजावट।
- ई - हँसी।
- ना - चलना, लिखना, पढ़ना।
उदाहरण :—
» पढ़ना क्रिया का परिणाम पढ़ाई है।
» मिलना क्रिया का परिणाम पहचान है।
» मिला देना क्रिया का परिणाम मिलावट है।
» हँसना क्रिया का परिणाम हँसी है।
» चलना क्रिया का परिणाम चलना है।
नोट :- हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी भाववाचक संज्ञा भाववाचक कृदंत प्रत्यय से नहीं बनती हैं। कुछ भाववाचक संज्ञाएँ क्रियाओं के मूल रूप से भी बनती हैं, जैसे- ज्ञान, प्रेम, द्वेष, भय, क्रोध आदि।
(घ). क्रिया करने का साधन (करणवाचक कृदंत प्रत्यय)
ये प्रत्यय क्रिया करने के साधन का बोध कराते हैं। उदाहरण के लिए, "चलनी" शब्द "चलना" क्रिया के साधन "नी" प्रत्यय से बना है। इसका अर्थ है "चलने के लिए"।
- अन - लेखन, गायन, शिक्षण, भवन, करण।
- नी - बुननी, सिलनी, फेंकनी, पीटनी।
- ई - पिटाई, धुलाई, सफाई, चाटाई, ढलाई।
- ना - बेलना, ढकना, पिटना, खोदना, बुनना।
नोट :- इन प्रत्ययों से बनने वाले भाववाचक संज्ञाओं का प्रयोग सामान्यतः क्रिया के साधन का बोध कराने के लिए किया जाता है।
(2). तद्धित प्रत्यय [taddhit pratyay kya hai] :- तद्धित प्रत्यय वे शब्द होते हैं जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में जुड़कर नए शब्दों को बनाते हैं। जैसे— 'धन' (शब्द) + 'वाण' (प्रत्यय) = 'धनवान' (तद्धित प्रत्यय), 'लुहार', 'बुढ़ापा', 'बहनोई', आदि।
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